क्या अंतराष्ट्रीय सामाजिक मानक किसी राष्ट्र की सामाजिक स्थिति का सही आंकलन कर पाने में पूर्णतः सक्षम है?

अंतराष्ट्रीय सामाजिक मानक किसी राष्ट्र की सामाजिक स्थिति का सही आंकलन कर पाने में पूर्णतः सक्षम है

  
                    "किसी पुस्तक का आंकलन उसकी जिल्द देखकर नहीं किया जा सकता"

लेकिन सामाजिक स्थिति का आंकलन किया जाता है कुछ अंतराष्ट्रीय मानकों के आधार पर जो सभी परिस्थितियों, व्यवस्थाओं और समस्याओं की जटिलता और असमानता को समझे बिना सभी देशों को एक ही तराजू में तोल लेते हैं। ये मानक वास्तविक स्थिति से परे किसी देश की कुछ अलग ही छवि पेश कर रहे होते हैं। अधिकांश गणनायें की जाती है उन आंकड़ों के आधार पर जो मुहैया कराई जाती हैं कुछ प्राइवेट कंपनियों के द्वारा जिनकी प्रामाणिकता व्यापक रूप से सही नहीं ठहराई जा सकती क्योंकि इन कम्पनियों की गणना का दायरा सीमित होता है। अगर बात वर्ल्ड हेपीनेस इंडेक्स 2019 की करें तो इसमें आंकड़े उपलब्ध कराते गये अमेरिकी कंपनी ‘गैल-अप वर्ल्ड पूल‘ द्वारा जिन्होंने वास्तव में गणना की प्रति देश दो से तीन हजार लोगों के प्रति व्यक्ति आय, सामाजिक सहयोग, आजादी, उदारता, जीवन प्रत्याशा और भ्रष्टाचार की समाप्ति जैसे मुद्दों के आधार पर और नाम दे दिया खुशहाली रिपोर्ट। इस रिपोर्ट में भारत 156 देशों में से 140वें स्थान पर था। यह जानकर आश्चर्य होगा कि पाकिस्तान 67 वें और बांग्लादेश 125वें स्थान पर था जबकि इन देशों में बेरोजगारी, अशिक्षा और आतंकवाद जैसी समस्याएं चरम पर हैं जो किसी भी देश में व्यवहारिक रूप से खुशहाली का न होना दिखाता है जबकि हेपीनेस इंडेक्स कुछ और ही छवि दर्शाता था। इसी प्रकार यू0 एन0 डी0 पी द्वारा कराये जाने वाली मानव विकास सूचकांक की गणना की जाती है जीवन प्रत्याशा, शिक्षा और जीवन के स्तर के आधार पर। अगर जीवन प्रत्याशा की बात करें तो यह निर्भर करता है देश की औसत आयु पर जो कई कारकों पर निर्भर करती है जैसे युद्ध, महामारी आदि पर । शिक्षा की गणना का आधार है कितने वर्ष शिक्षा ली जबकि इससे कोई मतलब नहीं कि क्या शिक्षा प्राप्त की और क्या यह शिक्षा उस व्यक्ति को अपने जीवन यापन करने के लिए आय अर्जित करने में सफल होगी या नहीं। 2019 की मानव विकास सूचकांक की रिपोर्ट में भारत को 189 देशों की सूची में 129 वॉ स्थान दिया गया जबकि 2018 में भारत 130 वें स्थान पर था। यू0 एन0 डी0 पी0 के अनुसार 2005-06 से 2015-16 के बीच 27.1 करोड लोगों को गरीबी के दायरे से बाहर निकला है लेकिन स्थिति अभी भी दयनीय है और इसमें सुधार की जरुरत है, अभी भी भारत श्रीलंका, ईरान और चीन जैसे देशों से पीछे है। वास्तव में सुधार की जरुरत तो है लेकिन सिर्फ आर्थिक स्वरुप में ही नहीं बल्कि यू0 एन0 डी0 पी जैसी संस्थाओं द्वारा की जाने वाली गणना के तरीकों में भी ताकि पता चल सके वास्तविक स्थिति का और हो सुधार उन पहलुओं पर जिनकी वास्तव में आवश्यकता है जमीनी स्तर पर। एक और रिपार्ट आयी थी 2019 में वर्ल्ड हंगर इंडेक्स की जिसमें 119 देशों में भारत को स्थान मिला 102 वॉ, जो कि एशियाई देशों में सबसे खराब थी। इसमें आंकडे लिए गए 2014 से 2018 तक के जिसमें कुपोषित बच्चों के अनुपात, 5 साल के बच्चे जिनकी लंबाई और वजन आयु के हिसाब से कम होना और 5 साल से कम आयु के बच्चों के मृत्यु दर को आधार बनाया गया। कुछ दशक पूर्व बालविवाह का प्रचलन था जो कुपोषण का मुख्य कारण था जो समय के साथ साथ समाप्त हो गया है। कुपोषण जन्म से ही शुरु हो जाता है और स्थिति आती है अल्प आयु में मृत्यु की।यहॉ केवल आधार बनाया गया भोजन की कमी से मृत्यु जो शायद सही नहीं है क्योंकि मृत्यु के लिए कई अन्य कारक भी उत्तरदायी हैं। अतः यह कहना सही नहीं होगा कि अंतरराष्ट्रीय मानक वास्तविक स्थिति का आंकलन करने में पूर्णतः सक्षम हैं। ये मानक स्थितियों का एक खाका तो दिखा देते है लेकिन शायद ये मानक स्थिति को स्पष्ट कर पाने में समर्थ नहीं हैं इनमें जरुरत है बदलाव की |

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